रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति से जुड़ी एक बेहद चर्चित और रहस्यमयी कहानी सामने आ रही है। इन दिनों राज्य में एक नाम लगातार सुर्खियों में है—राम गोपाल अग्रवाल। कभी सत्ता के गलियारों में प्रभावशाली माने जाने वाले राम गोपाल अग्रवाल जांच एजेंसियों की सक्रियता बढ़ते ही अचानक गायब हो गए हैं।
राजनीतिक गलियारों में सवाल गूंज रहा है कि आखिर राम गोपाल अग्रवाल कहां हैं। सत्ता के दौरान जिनका दबदबा ‘सुपर पावर’ जैसा बताया जाता था, वही शख्स सत्ता बदलते ही पूरी तरह से नजरों से ओझल हो गया।
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस शासनकाल में राम गोपाल अग्रवाल को पार्टी का कोषाध्यक्ष माना जाता था। उन पर कथित तौर पर शराब कारोबार से जुड़े सिंडिकेट को संचालित करने और नागरिक आपूर्ति निगम से जुड़े नान घोटाले के आर्थिक प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाने के आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता है कि करोड़ों रुपये की कथित अवैध कमाई का रास्ता उन्हीं के इशारों पर खुलता और बंद होता था।
जैसे ही सत्ता बदली और जांच एजेंसियों ने सक्रियता बढ़ाई, राम गोपाल अग्रवाल अचानक सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए। जांच फाइलों में उनका नाम बार-बार सामने आ रहा है, लेकिन वे खुद किसी भी मंच या एजेंसी के सामने नजर नहीं आ रहे।
शराब घोटाले को लेकर आरोप है कि कांग्रेस शासन के दौरान सरकारी शराब नीति के समानांतर एक अवैध सिंडिकेट खड़ा किया गया था। हर बोतल पर कथित अवैध वसूली होती थी और इस पूरे नेटवर्क का मास्टर माइंड राम गोपाल अग्रवाल को बताया जाता है। ईडी की जांच में उनका नाम कई बार दर्ज हुआ है।
राम गोपाल अग्रवाल पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबी माने जाते रहे हैं। वे लगभग एक दशक तक छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे। भूपेश बघेल के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए भी वे इसी पद पर थे। वर्ष 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने और भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद राम गोपाल अग्रवाल का राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव तेजी से बढ़ा।
कांग्रेस सरकार बनने के बाद राम गोपाल अग्रवाल को नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनाया गया। उनके कार्यकाल में कस्टम मिलिंग की प्रोत्साहन राशि 40 रुपये से बढ़ाकर 120 रुपये कर दी गई। ईडी की जांच में सामने आया कि इस बढ़ी हुई राशि के बदले कथित तौर पर कमीशन लिया गया।
ईडी की जांच में यह भी दावा किया गया है कि शराब घोटाले से जुड़ा पैसा कांग्रेस के कोषाध्यक्ष होने के नाते राम गोपाल अग्रवाल तक पहुंचता था। इस तरह नान घोटाला और शराब घोटाला—दोनों मामलों में एक ही नाम केंद्र में रहा।
सूत्रों का कहना है कि ईडी की संभावित गिरफ्तारी से बचने के लिए राम गोपाल अग्रवाल पिछले तीन वर्षों से भूमिगत हैं। न तो वे किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में दिखाई दिए हैं, न ही कोई बयान सामने आया है और न ही वे जांच एजेंसियों के सामने पेश हुए हैं। हैरानी की बात यह भी है कि प्रदेश कांग्रेस लंबे समय से बिना कोषाध्यक्ष के काम कर रही है।
अब पूरे प्रदेश की नजरें इस सवाल पर टिकी हैं कि यदि राम गोपाल अग्रवाल जांच एजेंसियों के हाथ लगे, तो क्या केवल उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी या फिर कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के नाम भी सामने आएंगे।

