रायपुर: ग्रामीण क्षेत्रों में खेती-किसानी के साथ पशुपालन किसानों की आमदनी बढ़ाने और परिवार को आत्मनिर्भर बनाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनता जा रहा है। विशेष रूप से भेड़ पालन कम जगह और अपेक्षाकृत सीमित संसाधनों में शुरू किया जा सकने वाला व्यवसाय है। ऊन और मांस के माध्यम से भेड़ पालक अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं। वहीं गाय पालन से दूध उत्पादन के जरिए नियमित आमदनी का स्रोत तैयार होता है।
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में पशुपालन आज भी आजीविका और आत्मनिर्भरता का सशक्त जरिया बना हुआ है। इसी का उदाहरण हैं सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला विकासखंड अंतर्गत ग्राम देवगांव निवासी विद्याधर यादव, जिन्होंने भेड़ और गाय पालन को स्वरोजगार का माध्यम बनाकर सफलता की मिसाल पेश की है।
70 भेड़ और एक गाय से व्यवस्थित पशुपालन
विद्याधर यादव के पास वर्तमान में करीब 70 भेड़ें और एक दूध देने वाली गाय है। वे पारंपरिक तरीके से पशुपालन करने के बजाय इसे व्यवस्थित व्यवसाय के रूप में संचालित कर रहे हैं।
भेड़ों को चराने के दौरान हिंसक जानवरों और आवारा कुत्तों से सुरक्षा के लिए उन्होंने दो विदेशी नस्ल के कुत्ते भी पाल रखे हैं। पशुओं की देखभाल और चराई के लिए उन्होंने गांव के दो अन्य लोगों को सुबह-शाम चरवाहे के रूप में रोजगार दिया है। इस तरह उनका पशुपालन व्यवसाय न केवल उनके परिवार की आय बढ़ा रहा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार का अवसर भी उपलब्ध करा रहा है।
पशुधन विभाग की नियमित निगरानी
विद्याधर यादव के पशुधन की देखभाल में पशुधन विभाग की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। विभाग के कर्मचारी नियमित रूप से उनके घर पहुंचकर पशुओं का टीकाकरण और स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं। इससे पशुओं को बीमारियों से बचाने और उनके बेहतर स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद मिल रही है।
हाल ही में पशुधन विभाग के उप संचालक ने विद्याधर यादव के घर पहुंचकर उनके पशुधन के रखरखाव और प्रबंधन का जायजा लिया तथा उनके प्रयासों की सराहना की।
पशुपालन से सालाना करीब 2 लाख रुपये की आमदनी
मेहनत और बेहतर प्रबंधन के चलते विद्याधर यादव को पशुपालन से प्रतिवर्ष करीब 2 लाख रुपये की आमदनी हो रही है। इसमें से चारे और चरवाहों के खर्च के रूप में लगभग 50 हजार रुपये खर्च होते हैं। इसके बाद भी उनके पास अच्छी-खासी शुद्ध आय बचती है।
भेड़ पालन में चारे का खर्च अपेक्षाकृत कम रहता है, क्योंकि भेड़ें प्राकृतिक रूप से घास और स्थानीय चारे पर निर्भर रह सकती हैं। इसी कारण सीमित संसाधनों वाले ग्रामीण परिवारों के लिए भेड़ पालन स्वरोजगार का उपयोगी विकल्प बन सकता है।
पशुपालन से ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार के अवसर
विद्याधर यादव की सफलता यह दिखाती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन को योजनाबद्ध तरीके से अपनाकर परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जा सकता है। इसके साथ ही पशुपालन से जुड़े कामों के माध्यम से गांव के अन्य लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
विद्याधर यादव का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन के जरिए स्वरोजगार के नए रास्ते खोले जा सकते हैं। इसके लिए परिवार की मजबूत इच्छाशक्ति, पशुओं के प्रति लगाव तथा उनके रखरखाव और बीमारियों की सही जानकारी जरूरी है।
आत्मनिर्भरता की मिसाल बना परिवार
आज विद्याधर यादव और उनका पूरा परिवार पशुपालन के माध्यम से लगातार आगे बढ़ रहा है। भेड़ और गाय पालन से प्राप्त आय ने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विद्याधर यादव की कहानी ग्रामीण अंचलों के उन परिवारों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद स्वरोजगार शुरू कर अपनी आय बढ़ाना चाहते हैं। सही प्रबंधन, मेहनत और पशुओं की नियमित देखभाल के जरिए पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।


