रायपुर में तीन दिवसीय ‘रंग तरंग’ कार्यक्रम का पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों की मनमोहक प्रस्तुतियों के साथ भावपूर्ण समापन हुआ। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक और पॉप संगीत के दौर में आयोजित इस कार्यक्रम ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और पारंपरिक संगीत को मंच प्रदान किया।
कार्यक्रम के अंतिम दिन मांदरी और ढोलक की थाप के साथ कलाकारों ने शानदार प्रस्तुतियां दीं। लोक संगीत की धुनों से पूरा परिसर गूंज उठा और दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ के उन पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों के संरक्षण और संवर्धन को बढ़ावा देना था, जो धीरे-धीरे विलुप्त होने की स्थिति में हैं और कभी प्रदेश के तीज-त्योहारों तथा लोक आयोजनों का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे।
संस्कृति विभाग के संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि लोक वाद्ययंत्र और पारंपरिक लोक कलाएं केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे हमारी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन कलाओं को संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
रंग तरंग कार्यक्रम के मुख्य तथ्य
- कार्यक्रम: रंग तरंग (Rang Tarang Program CG)
- मुख्य थीम: विलुप्त हो रहे लोक वाद्ययंत्रों का संरक्षण एवं संवर्धन
- प्रमुख वाद्ययंत्र: मांदरी और ढोलक
- आयोजक: संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन
- संचालक: डॉ. संजय कन्नौजे
- विशिष्ट अतिथि: समाजसेवी उदयभान एवं वरिष्ठ पत्रकार-छायाकार दीपेंद्र दीवान
अंतिम दिन इन कलाकारों ने दी शानदार प्रस्तुति
कार्यक्रम के अंतिम दिन वाद्ययंत्र आधारित विशेष प्रस्तुतियां हुईं। इसमें शास्त्रीय और लोक वाद्ययंत्रों का सुंदर संगम देखने को मिला।
- डॉ. के. रोहन नायडू, रायपुर — वायलिन वादन से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
- श्री नासिर खान, अंबिकापुर — तबला वादन में लय और ताल का शानदार प्रदर्शन किया।
- श्री संजू कुमार सेन, बालोद — पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को मंच पर जीवंत किया।
- श्री प्रेम यादव, गरियाबंद — छत्तीसगढ़ी पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं।
कार्यक्रम में समाजसेवी श्री उदयभान और वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार श्री दीपेंद्र दीवान समेत कई कला प्रेमी एवं गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।
दर्शकों ने कहा कि ऐसे आयोजनों से कलाकारों को प्रोत्साहन मिलने के साथ-साथ युवा पीढ़ी भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और लोक परंपराओं से जुड़ती है।
छत्तीसगढ़ के लोक वाद्ययंत्र: CGPSC के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
‘रंग तरंग’ कार्यक्रम के संदर्भ में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक वाद्ययंत्र प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।
मांदरी/मांदर छत्तीसगढ़ का प्रमुख पारंपरिक अवनद्ध वाद्ययंत्र है। इसका उपयोग विशेष रूप से बस्तर क्षेत्र की जनजातीय लोक परंपराओं और नृत्यों में किया जाता है।
भारतीय संगीत शास्त्र में वाद्ययंत्रों को सामान्यतः चार वर्गों में बांटा जाता है—
- अवनद्ध वाद्य — चमड़े से मढ़े हुए वाद्य, जैसे मांदर, ढोलक, नगाड़ा।
- तत वाद्य — तार वाले वाद्य, जैसे वायलिन।
- सुषिर वाद्य — फूंक से बजाए जाने वाले वाद्य, जैसे बांसुरी और मोहरी।
- घन वाद्य — ठोस धातु या लकड़ी से बने वाद्य, जैसे मंजीरा और झांझ।
लोक वाद्ययंत्रों का संरक्षण क्यों जरूरी?
लोक वाद्ययंत्र किसी क्षेत्र की केवल संगीत परंपरा नहीं बताते, बल्कि वहां की जीवनशैली, लोक आस्था, तीज-त्योहार और सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाते हैं।
आधुनिक संगीत और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच पारंपरिक वाद्ययंत्रों और उन्हें बनाने वाले कारीगरों के सामने चुनौती बढ़ी है। ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों से पारंपरिक कलाकारों और वाद्य निर्माण से जुड़े शिल्पकारों को मंच और प्रोत्साहन मिल सकता है।


