कोरबा। औद्यो गिक नगरी कोरबा में सोमवार को दिनभर सियासी गतिविधियों ने माहौल गरमा दिया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कोरबा प्रवास को लेकर जिला संगठन द्वारा जारी आमंत्रण पत्र से शुरू हुई “कार्ड पॉलिटिक्स” जहां जिले से लेकर राजधानी तक चर्चा का विषय बनी रही, वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के नए जिला कार्यालय “अटल स्मृति” के भूमिपूजन के विरोध में युवा कांग्रेस का प्रदर्शन भी सुर्खियों में रहा।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सोमवार को कोरबा में भाजपा के नवीन जिला कार्यालय “अटल स्मृति” का विधिवत भूमिपूजन किया। इस कार्यक्रम को लेकर जारी आमंत्रण पत्र में वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर की अनदेखी को लेकर पार्टी के भीतर ही असंतोष की चर्चा होती रही। आमंत्रण पत्र में बार-बार किए गए फेरबदल ने स्थानीय स्तर पर भाजपा संगठन में व्याप्त गुटबाजी और नेतृत्व क्षमता को लेकर सवाल खड़े कर दिए। दोपहर तक राजनीतिक गलियारों में जिला संगठन की कार्यशैली को लेकर चर्चाएं तेज रहीं।
इसी बीच मुख्यमंत्री की शहर में मौजूदगी के दौरान युवा कांग्रेस द्वारा किसानों के मुद्दे को लेकर पूर्व घोषित विरोध प्रदर्शन भी सामने आया। हालांकि यह प्रदर्शन मुख्यमंत्री के कार्यक्रम स्थल से करीब 8 से 9 किलोमीटर दूर ट्रांसपोर्ट नगर स्थित पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल के कार्यालय से शुरू किया गया।
विरोध प्रदर्शन की सूचना पर पुलिस विभाग ने पहले से ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर रखे थे। बालको थाना पुलिस दलबल के साथ मौके पर तैनात थी। लेकिन जब प्रदर्शन शुरू हुआ तो स्थिति कुछ और ही नजर आई। किसानों की समस्याओं को लेकर महज 7 से 8 युवा कांग्रेसियों का समूह हाथों में तख्तियां लेकर सड़क पर उतरा। यह प्रदर्शन पूर्व मंत्री के कार्यालय से निकलने के कुछ ही कदम बाद, चंद मिनटों में समाप्त हो गया।
वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि प्रदर्शनकारियों को महज 10 से 15 कदम चलते ही पुलिस ने नियंत्रित कर लिया। औपचारिकता निभाने के लिए प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हल्की झूमाझटकी जरूर हुई, लेकिन माहौल पूरी तरह नियंत्रित और शांत रहा। प्रदर्शनकारियों के चेहरों पर नारों की गर्मी थी, वहीं पुलिसकर्मियों के चेहरों पर मुस्कान साफ नजर आई। यह दृश्य खुद ही इस बात की गवाही देता दिखा कि विरोध और व्यवस्था के बीच सब कुछ आपसी समझ के तहत हो रहा था।
कुल मिलाकर मुख्यमंत्री के कोरबा प्रवास के दौरान हुआ यह प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन न तो सरकार पर कोई दबाव बना सका और न ही किसानों के मुद्दे पर कोई ठोस संदेश जनता तक पहुंचा पाया। उल्टे इस प्रदर्शन ने विपक्ष में बैठी कांग्रेस की आंतरिक स्थिति और जमीनी पकड़ को उजागर कर दिया। सत्ता से बाहर होने के बाद भी पार्टी गुटीय राजनीति से उबरती नजर नहीं आ रही है। किसानों जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर भी कांग्रेस की एकजुटता और प्रभावी रणनीति की कमी साफ दिखाई दी।


