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    Home » Blog » Hareli 2026: छत्तीसगढ़ का पहला लोकपर्व हरेली, जानिए खेती, पशुधन और गेड़ी से जुड़ी खास परंपराएं
    छत्तीसगढ़

    Hareli 2026: छत्तीसगढ़ का पहला लोकपर्व हरेली, जानिए खेती, पशुधन और गेड़ी से जुड़ी खास परंपराएं

    Mahendra SahuBy Mahendra SahuAugust 12, 2026No Comments4 Mins Read
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    रायपुर। छत्तीसगढ़ का पहला लोकपारंपरिक पर्व हरेली माना जाता है। सावन महीने की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व छत्तीसगढ़ की कृषि, संस्कृति और ग्रामीण परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि हरेली तक किसान धान की रोपाई जैसे प्रमुख कृषि कार्य पूरे कर लेते हैं। इसके बाद किसान खेती-किसानी के साथ प्रकृति और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हरेली तिहार मनाते हैं।

    हरेली तिहार के अवसर पर किसान अपने पशुधन की पूजा करते हैं और खेती में इस्तेमाल होने वाले कृषि औजारों को साफ कर उनकी पूजा करते हैं। नांगर (हल), रापा (फावड़ा), जुड़ा-दतारी, कुदारी, बसला और टंगिया जैसे औजारों को धोकर घर के आंगन में सजाया जाता है। इसके बाद धूप-दीप से पूजा कर नारियल और गुड़ के चीले का भोग लगाया जाता है। गांवों में ठाकुरदेव की पूजा करने की भी परंपरा है।

    हरेली से पशुधन के स्वस्थ और निरोग रहने की मान्यता भी जुड़ी हुई है। इस दिन किसान और पशुपालक अपने पशुओं को गौठान ले जाकर गेहूं के आटे से बनी लोंदी खिलाते हैं। इसके पीछे पशुओं को स्वस्थ रखने की पारंपरिक मान्यता है। वापस लौटते समय यादव समाज के लोग जंगल से लाए गए कंदमूल किसानों को देते हैं, जिसे गांव के लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि जंगली कंदमूल का सेवन शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक होता है।

    हरेली तिहार पर पशुधन को विशेष रूप से सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। किसानों के जीवन में बैल और अन्य पशुओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसलिए उनके सम्मान में विशेष आयोजन किए जाते हैं। इन आयोजनों में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और ग्रामीण जीवन की परंपराएं स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।

    हरेली तिहार का सबसे खास आकर्षण गेड़ी भी है। पर्व से कई दिन पहले ही घरों में गेड़ी तैयार होने लगती है। हरेली के दिन बच्चे और बड़े लकड़ी और बांस से बनी गेड़ी पर चढ़कर गांव की गलियों में घूमते हैं। गेड़ी चलाने की यह परंपरा बच्चों और युवाओं के बीच विशेष उत्साह पैदा करती है और हरेली के आनंद को और बढ़ा देती है।

    हरेली के दिन घरों में विभिन्न तरह के छत्तीसगढ़ी व्यंजन भी बनाए जाते हैं। गुरहा चीला, बरा, सोहारी और गुलगुला भजिया जैसे पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं। इन व्यंजनों का भोग भी पूजा के दौरान लगाया जाता है। इस तरह हरेली में धार्मिक और कृषि परंपराओं के साथ छत्तीसगढ़ी खान-पान और लोक संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है।

    हरेली की एक अन्य परंपरा नीम की डाल लगाने से जुड़ी है। पर्व की शाम यादव समाज के लोग घरों के मुख्य दरवाजे पर नीम की डाल लटकाते हैं। इसके पीछे नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखने और घर को कीटाणुओं तथा बीमारियों से बचाने की पारंपरिक मान्यता जुड़ी हुई है।

    हरेली को छत्तीसगढ़ का पहला त्योहार भी कहा जाता है। मान्यता है कि इसी पर्व के साथ प्रदेश के पारंपरिक लोकपर्वों की शुरुआत होती है। इसलिए ग्रामीण अंचलों में इसका विशेष सांस्कृतिक महत्व है। हरेली का संबंध हरियाली से भी जोड़ा जाता है, क्योंकि बारिश के मौसम में खेत-खलिहान और आसपास का प्राकृतिक वातावरण हरा-भरा हो जाता है।

    हरेली से जुड़ी कुछ अंधविश्वास आधारित मान्यताएं भी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित रही हैं। कुछ स्थानों पर हरेली की रात जादू-टोना और टोनही जैसी गतिविधियों से संबंधित धारणाएं देखने को मिलती हैं। हालांकि इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। सामाजिक संगठन और जागरूक लोग ऐसी अंधविश्वासपूर्ण धारणाओं के खिलाफ लोगों को जागरूक करने का प्रयास करते हैं।

    हरेली तिहार मूल रूप से किसान, खेती, पशुधन, प्रकृति और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति से जुड़ा पर्व है। कृषि औजारों की पूजा से लेकर पशुधन के सम्मान, पारंपरिक व्यंजनों और गेड़ी की मस्ती तक, हरेली छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन और लोक परंपराओं की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करता है।

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