रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल पर प्रदेश के आदिवासी अंचलों के बच्चों और किशोर-किशोरियों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण एवं सुरक्षित भविष्य के लिए स्थानीय संस्कृति, सामुदायिक नेतृत्व और व्यवहार विज्ञान आधारित योजनाएं तैयार की जाएंगी। इसी उद्देश्य से आदिम जाति विकास विभाग और यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में राजधानी रायपुर में ‘मूल मंथन: आदिवासी ज्ञान से किशोरावस्था की पुनर्कल्पना’ विषय पर दो दिवसीय क्षेत्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ।
कार्यशाला के पहले दिन विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और जनजातीय समुदाय के प्रतिनिधियों ने इस बात पर सहमति जताई कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखते हुए सामुदायिक नेतृत्व को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना ही स्थायी परिवर्तन का सबसे प्रभावी मार्ग है।
राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा कि जनजातीय समुदायों के साथ सम्मान, संवेदनशीलता और विश्वास के आधार पर जुड़कर ही प्रभावी नीतियां बनाई जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि योजनाओं का निर्माण समुदायों की वास्तविक आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को केंद्र में रखकर किया जाना चाहिए।
आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने कहा कि बस्तर सहित जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की पहुंच लगातार बढ़ रही है। उन्होंने स्थानीय भाषाओं को व्यवहार परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि विकास का उद्देश्य जनजातीय संस्कृति को बदलना नहीं, बल्कि उसकी अंतर्निहित शक्ति को पहचानकर समाज के हित में उपयोग करना है।
उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में 43 जनजातियां निवास करती हैं और राज्य की 31 प्रतिशत से अधिक आबादी जनजातीय समुदाय से संबंधित है। केंद्र और राज्य सरकार की पीएम जनमन योजना, धरती आबा ग्राम उत्कर्ष अभियान, एकलव्य विद्यालय, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सहायता और अन्य योजनाओं के माध्यम से जनजातीय समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है।
प्रमुख सचिव ने बताया कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल पर अखरा विकास योजना शुरू की गई है। साथ ही बैगा, गुनिया, मांझी, चालकी और सिरहा जैसे पारंपरिक जनजातीय संरक्षकों को संस्कृति संरक्षण में योगदान के लिए प्रोत्साहन राशि देने का भी प्रावधान किया गया है।
कार्यशाला में राज्य और राष्ट्रीय स्तर के नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, जनजातीय प्रतिनिधियों, विकास भागीदारों और युवा नेतृत्व ने भाग लिया। दिनभर चले तकनीकी सत्रों में एनीमिया, कुपोषण, किशोर स्वास्थ्य, स्वच्छता, मानसिक स्वास्थ्य, सुरक्षित किशोरावस्था और सामुदायिक सहभागिता जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई।
विशेषज्ञों ने कहा कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। दीर्घकालिक परिवर्तन के लिए स्थानीय नेतृत्व, सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त संवाद, व्यवहार विज्ञान आधारित रणनीतियां और विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।
पैनल चर्चा में जनजातीय युवाओं और सामुदायिक प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब समुदाय स्वयं विकास प्रक्रिया का नेतृत्व करता है, तब स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण से जुड़े कार्यक्रम अधिक प्रभावी और टिकाऊ साबित होते हैं।
दो दिवसीय कार्यशाला के दूसरे दिन विषयगत समूहों की चर्चाओं के आधार पर राज्य के लिए व्यवहार परिवर्तन एवं सामुदायिक सहभागिता का व्यापक रोडमैप तैयार किया जाएगा। साथ ही आदिवासी किशोरों के समग्र विकास, कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन और भविष्य की रणनीतियों को लेकर महत्वपूर्ण अनुशंसाएं भी प्रस्तुत की जाएंगी।


